अब जनता जग रही है
अबकी बार,
किसी रईस बाप के बिगडैल बेटों के
हवस का शिकार नहीं हुई कोई युवती
किसी तंदूर में नहीं जलाई गयी कोई स्त्री
किसी राजनेता के प्रेम-पाश की
पाशविकता का शिकार नहीं हुई कोई युवा कवयित्री
देह व्यापर की दलाली में सामने नहीं आया कोई बड़ा नाम
किसी बड़े गायक पर भी नहीं लगा
बच्चों को नाजायज ढंग से विदेश भेजने का इल्जाम
किसी आला अधिकारी पर भी नहीं लगा यौन शोषण का आरोप
अपने ही दोस्तों द्वारा गैंगरेप और ब्लैकमेल की शिकार
किसी किशोरी की आत्महत्या का मामला भी नहीं है जनाब
ना निठारी सरीखे किसी दूसरे अपराध का पर्दाफाश
ना राष्ट्रिय-राजधानी क्षेत्र की किसी लड़की की मर्डर मिस्त्री
जो छाई रही हो समाचारों की सुर्ख़ियों में महीनो तक
ना किसी घोटाले या भ्रस्टाचार की ऐसी बड़ी खबर
जिसमे शामिल हों
बड़े नेता सैन्य अधिकारी या न्यायाधीश तक
जो हो सक्तो हो सनसनीखेज खबर की सूचि में
फिलवक्त ...
जो दिखाई जा सके समाचार चैनलों पर
कई-कई दिनों तक कई- कई बार
लूट-पाट, हत्या, बलात्कार, घोटाला, भ्रष्टाचार...
रोज की इन खबरों के बीच
यदि इस खबर ने चौकाया, ध्यान किया आकृष्ट
तो सिर्फ इसलिए कि एक आम आदमी
उसमे भी एक अबला स्त्री ने
सरेआम एक विधायक कि चाकू मारकर हत्या कर दी
हांलाकि जनता के बदते असंतोष के फूटते इस आक्रोश को
बनानी चाहिए थी देश कीसबसे बड़ी सनसनीखेज खबर
बजाये इसके,
मीडिया ने सुरक्षाकर्मियों की मुस्तैदी का सवाल उठाया
विधायकों ने अपनी चाक चौबंद सुरक्षा व्यवस्था का
उपमुख्यमंत्री ने ईसपर अविलम्ब विचार करने की बात कही
मुख्यमंत्री ने घटना पर चिंता जताते हुए जाँच की बात कही
किन्तु इसमें उस औरत की चिंता कहीं शामिल नहीं थी
ना शक के आधार पर गिरफ्तार किये गए उसके साथी की
इस ठिठुरते ठण्ड में जिसे नहीं देने दिए गए गरम कपडे भी
न मिलने दिया गया उन्हें उनके परिजनों से.
सदन में बहस जारी थी
जिसमे जनप्रतिनिधियों के चरित्र, सदाचार
और आम आदमी की सुरक्षा और असंतोष से
ज्यादा महत्वपूर्ण था
जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा व्यवस्था का सवाल
लोकतंत्र की लहर में ढह गया नेपाल का राजतन्त्र
पाकिस्तान का तानाशाही सैनिक शासन
ट्यूनीशिया में जनविद्रोह से डरकर भाग गया शासक
मिश्र में जन-आंदोलनों के आगे झुक गया हुस्नी मुबारक
इंग्लैंड का अस्त हो गया सूरज
रूस का किला ढह गया
ढह गयी बर्लिन की दिवार
शासन के विरुद्ध चीन में भी पनप रहा है लोगो का आक्रोश
जनता के धन पर करते ऐयाशी , बटोरते ऐश्वर्य
उनसे प्राप्त शक्ति का
भस्मासुर की तरह उन्ही के विरुद्ध करते प्रयोग
जनप्रतिनिधियों चेतो
अब जनता जग रही है.
वर्तमान साहित्य अक्टूबर २०११ में प्रकाशित
अबकी बार,
किसी रईस बाप के बिगडैल बेटों के
हवस का शिकार नहीं हुई कोई युवती
किसी तंदूर में नहीं जलाई गयी कोई स्त्री
किसी राजनेता के प्रेम-पाश की
पाशविकता का शिकार नहीं हुई कोई युवा कवयित्री
देह व्यापर की दलाली में सामने नहीं आया कोई बड़ा नाम
किसी बड़े गायक पर भी नहीं लगा
बच्चों को नाजायज ढंग से विदेश भेजने का इल्जाम
किसी आला अधिकारी पर भी नहीं लगा यौन शोषण का आरोप
अपने ही दोस्तों द्वारा गैंगरेप और ब्लैकमेल की शिकार
किसी किशोरी की आत्महत्या का मामला भी नहीं है जनाब
ना निठारी सरीखे किसी दूसरे अपराध का पर्दाफाश
ना राष्ट्रिय-राजधानी क्षेत्र की किसी लड़की की मर्डर मिस्त्री
जो छाई रही हो समाचारों की सुर्ख़ियों में महीनो तक
ना किसी घोटाले या भ्रस्टाचार की ऐसी बड़ी खबर
जिसमे शामिल हों
बड़े नेता सैन्य अधिकारी या न्यायाधीश तक
जो हो सक्तो हो सनसनीखेज खबर की सूचि में
फिलवक्त ...
जो दिखाई जा सके समाचार चैनलों पर
कई-कई दिनों तक कई- कई बार
लूट-पाट, हत्या, बलात्कार, घोटाला, भ्रष्टाचार...
रोज की इन खबरों के बीच
यदि इस खबर ने चौकाया, ध्यान किया आकृष्ट
तो सिर्फ इसलिए कि एक आम आदमी
उसमे भी एक अबला स्त्री ने
सरेआम एक विधायक कि चाकू मारकर हत्या कर दी
हांलाकि जनता के बदते असंतोष के फूटते इस आक्रोश को
बनानी चाहिए थी देश कीसबसे बड़ी सनसनीखेज खबर
बजाये इसके,
मीडिया ने सुरक्षाकर्मियों की मुस्तैदी का सवाल उठाया
विधायकों ने अपनी चाक चौबंद सुरक्षा व्यवस्था का
उपमुख्यमंत्री ने ईसपर अविलम्ब विचार करने की बात कही
मुख्यमंत्री ने घटना पर चिंता जताते हुए जाँच की बात कही
किन्तु इसमें उस औरत की चिंता कहीं शामिल नहीं थी
ना शक के आधार पर गिरफ्तार किये गए उसके साथी की
इस ठिठुरते ठण्ड में जिसे नहीं देने दिए गए गरम कपडे भी
न मिलने दिया गया उन्हें उनके परिजनों से.
सदन में बहस जारी थी
जिसमे जनप्रतिनिधियों के चरित्र, सदाचार
और आम आदमी की सुरक्षा और असंतोष से
ज्यादा महत्वपूर्ण था
जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा व्यवस्था का सवाल
लोकतंत्र की लहर में ढह गया नेपाल का राजतन्त्र
पाकिस्तान का तानाशाही सैनिक शासन
ट्यूनीशिया में जनविद्रोह से डरकर भाग गया शासक
मिश्र में जन-आंदोलनों के आगे झुक गया हुस्नी मुबारक
इंग्लैंड का अस्त हो गया सूरज
रूस का किला ढह गया
ढह गयी बर्लिन की दिवार
शासन के विरुद्ध चीन में भी पनप रहा है लोगो का आक्रोश
जनता के धन पर करते ऐयाशी , बटोरते ऐश्वर्य
उनसे प्राप्त शक्ति का
भस्मासुर की तरह उन्ही के विरुद्ध करते प्रयोग
जनप्रतिनिधियों चेतो
अब जनता जग रही है.
वर्तमान साहित्य अक्टूबर २०११ में प्रकाशित
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