Sunday, November 13, 2011

हमारा राष्ट्रीय गर्व 

हमारे देश का राष्ट्रीय गर्व है
नियम और निषेध के विरुद्ध आचरण .
समाज में ऊंची है उन्ही की साख
जो लिए फिरते हैं कानून अपने हाथ ;
नैतिकता और मर्यादा भी जिनके अनुसार
बदल लेती है अपनी परिभाषा .
बचा है उसी का वजूद
जिसके  होने  के विरुद्ध बोलती रहीं
तमाम ऋचाएं संविधान की सारी धाराएँ


मसलन गीता  और कुरान
और इसका सारा ज्ञान
जिसे लाल कपडे  में बांध रख दिया गया है
अदालत या पूजा स्थान
जिसकी सपथ ले हम धडल्ले से बोल लेते हैं झूठ
जो  होता है हमारे अनुकूल


मसलन लोक कल्याणकारी संविधान
जिसकी शपथ लेते ही राजनेतागण
हो  जाते हैं शहंशाह
वे रौंद  सकते हैं जनता  की उम्मीदें
उनके सपने, उनकी अस्मिता सरेआम

मसलन कानून
जिसकी हद से अक्सर बाहर रहते हैं
इसकी धज्जियाँ उड़ाते अपराधी
आँखों पर बांधे पट्टी कानून की देवी
अपने आबरू से खेलने वालों को
 पहचान भी नहीं सकती

जी हाँ जनाब, इन सबकी बिसात
सड़क किनारे के उस वर्जित कोने की तरह है
जहाँ हमारे जैसे सभ्य, संभ्रांत और शिक्षित लोग भी
खैनी-पान खाकर थूकते और मूतते हैं
बिंदास...  बेपरवाह...
बावजूद इसके कि
बड़े बड़े अक्षरों में साफ-साफ लिखा होता है
यहाँ थूकना और मूतना मन है.
                                               
  वर्तमान साहित्य अक्टूबर २०११ में प्रकाशित

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