Thursday, November 18, 2010

सत्ता



सुनो स्वर्गाधिपति
हमारे भाग्य के नियंता बन
तुम जहाँ बैठे हो, बिठा दिए गए हो
जहाँ स्थापित कर दिया गया है तुम्हें
लाख कोसने गालियाँ देने
यहाँ तक की
तुम्हारे अस्तित्वा पर प्रश्नचिन्ह लगाये जाने के बाद भी
तुम बने हुए हो अक्षुण्ण
चिर स्थाई मुस्कान बिखेरते
गर्भ गृहों में
हमारी आस्थाओं में खंडित होने के बाद भी

स्वगाधिपति
भले ही हमेशा हिलता रहता है तुम्हारा सिंहासन
किसी महिसासुर का बल या विश्वामित्र की तपस्या
नहीं छीन सकती तुमसे तुम्हारी सत्ता
कि संसार को मायाजाल में उलझाये रखने की
तुम्हारे पास बहुत है युक्ति
रम्भा, मेनका या उर्वशी
या तुम्हारे कल छल का बल
डिगा सकता है किसी कि तपस्या
रोक सकता है स्वर्गारोहण से किसी को
किन्तु जब तुमसे ही उत्पन्न
तुमसे ही वरदानित
असुरी शक्तियों का उभरता है तांडव
और अपने सारे कल छल बल के बावजूद
असमर्थ होने लगते हो विजयी होने में
खतरे में पड़ जाता है तुम्हारा स्वर्ग
तब अपनी अपनी शक्तियों के समन्वय से
उत्पन्न कर एक शक्ति
अपने अपने आयुधों से लैस कर
जब समर में उतारते हो रणचंडी
 तब इन्द्र!
तुम्हारी सत्ता को कौन दे सकता है चुनौती

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