Monday, November 15, 2010

मृगतृष्णा



रेगिस्तान सी
वीरान जिंदगी में
चला जा रहा हूँ अकेला
देखता हूँ हर तरफ रेत
तपती रेत ही रेत
चाहता हूँ थोड़ी छांव
जहाँ सुस्ता सकूँ
ठंडा पानी जो प्यास बुझा सके
नर्मघास जिसपर बेफिक्र हो सो सकूँ
दूर... कहीं दूर...
पानी देखते ही दौड़ पड़ता हूँ
और पाता हूँ सिर्फ रेत ही रेत
तपती रेत
बदहवास मै...
मेरे पैर में छाले
प्रतिज्ञा करता हूँ
मरीचिकाओं से आकर्षित ना होने की
बार... बार...
पर हर बार ऐसा ही होता है
तपते रेत पर झुलसते हुए
मै ...
इन मरीचिकाओं के आकर्षण से
मुक्त नहीं हो पाता

किसी उम्मीद में
फिर दौड ही पड़ता हूँ
एक नई मरीचिका की ओर

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